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भारत मां का दर्द.....

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न जाने ये मेरे देश को किसकी नज़र लग गई है कल तक तो इसमें दोस्त थे आज दुश्मन बसते हैं भारत की आन बान शान कही जाती हैं नारियां आज कुछ जहरीले नाग उन देवियों को ही डसते हैं दर्द इतना है मेरी भारत मां को कि वो बयां नहीं कर पा रही है एक के बाद एक मिले दर्दों को इस दिल में जगह नहीं दे पा रही है फिर भी वो मां है वो खुद तो कुछ कर नहीं सकती बच्चों को सुधारने के लिए किसी फरिश्ते का इंतज़ार किए जा रही है गल्ती से मेरी मां ने कुछ गुंडों को फरिश्ता समझ लिया आज उन्हीं के दिए ज़हर को वो पिए जा रही है लेकिन उसे उम्मीद है कि एक दिन तो उसे कोई अमृत भी देगा आज इसी उम्मीद के सहारे वो डाकुओं के बीच जिए जा रही है इंतज़ार है उसे कि कोई तो इस देश को फिर से सिखाएगा वो प्यार जिस प्यार के दम पर वो सदियों से एक धुरी पर टिकी आ रही है  न जाने वो दिन कब आएगा जब देश में होंगे सब फरिश्ते अपने ईश्वर से बस यही सवाल किए जा रही है न जाने मेरी कोख को किसकी नज़र लग गई है वो किसी फरिश्ते को अब जन्म नहीं दे पा रही है कल तक तो इस गोद में खेलते थे स...

एक ही सॉल्यूशन सिर्फ “राइट टू रिकॉल”

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ये बात सच है कि जब जब देश में अहम परिवर्तन हुए हैं तब तब आधियां तो चली हैं ऐसी ही एक आंधी चली थी अन्ना के समय पर जिस आन्दोलन का देश की जनता ने गांधी के बाद पहली बार पूरा प्रभाव देखा और सरकार की नींव को हिलने पर मजबूर कर दिया भले ही लोकपाल बिल जो जनता चाहती थी वैसा नहीं आया। और सरकार ने अपनी ही चलाई, लेकिन देश की जनता को अनशन की ताकत का एक मूल मंत्र मिल गया। जिसको तब से लेकर अब तक कई बार दोहराया जा चुका है। कई बार इसके परिणाम अच्छे मिले और कई बार किसी ने नहीं पूछा, तो कई बार जनता अनशन पंडाल में टूट कर गिरी तो कई बार चंद लोगों से ही पंडाल सजता हुआ दिखाई दिया। चंद लोगों से सजा हुआ पंडाल का नज़ारा अभी हाल ही में बैठे अन्ना के पूर्व सहयोगी और अब आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के अनशन पर भी दिखा जो अनशन दिल्ली के लोगों के लिए सबसे अहम बिजली पानी की समस्याओं से निजात दिलाने के लिए था लेकिन आन्दोलन को लोगों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और न दिखी मीडिया की कवरेज। जिससे कई सवाल उठे कि क्या मीडिया सिर्फ ऐसी ही जगह की कवरेज करती है जहां मसाला होता है या फिर वास्तव में अब अनशन शब्द एक बिज...