संसद का खेल

संसद में ये आखिर क्या खेल चल रहा है लेकिन इस शतरंज की बिसाद पर  हम आम आदमी का पैसा आखिर क्यों पानी की तरह बहाया जा रहा है ये बहुत सोचने वाली बात है पार्टियां अपना स्वार्थ साधने के लिए हम लोगों का पैसा संसद में चिल्ला चिल्ला कर खर्च कर रही है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलता हम एक सांसद को भेजते तो हैं ये सोचकर कि ये हमारा आदमी है हमारी मदद करेगा लेकिन वो तो संसद का होकर रह जाता है वो फिर जनता के बारे में न सोचकर अपना उल्लू सीधा करने में जुट जाता है संसद में जो हंगामेदार एफडीआई पर बहस चल रही है  उससे तो यही लगता है कि ज्वलंत मुद्दों के फेर में सभी पार्टियां  अपनी अपनी ताकत दिखाने में जुटी हैं कि मुझसे बढ़कर कोई नहीं लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि उनसे बड़ी जनता है जो सब देख रही है कि नियमों की आड़ में सांठगांठ का क्या खेल चल रहा है
सांठगांठ के इस खेल में नेता बाहर तो एक दूसरे पर लांछल लगाने से नहीं थकते लेकिन अपने घर यानि कि संसद में सब एक दूसरे के साथी हो जाते हैं जिसका जीता जागता उदाहरण है एम करुणानिधि जिन्होंने पहले एफडीआई का विरोध कर सुर्खियां बंटोरी और जब एफडीआई का मुद्दा उनके घर संसद में गया तो फिर एक दूसरे के सहयोगी बन गए मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि वो एफडीआई जो बाहर तक खराब होती थी वो घर में आकर क्यों अच्छी बन जाती है ये वाकई एक खेल है जो सबको दिखाई देता है लेकिन नताओं को इस बात का चैन है कि देश की जनता मौन है । 

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