घर के "फाके" ने पहुंचा दिया "फांसी" तक
मौहम्मद अजमल आमिर कसाब और उसके साथियों ने 2008 में मुंबई के कई
महत्वपूर्ण इलाकों में हमला कर देश को हिला कर रख दिया जिन्होंने एक ऐसा तांडव किया जो
देश के इतिहास में काले दिन के रूप में जाना गया जी हां 26/11 का वो बदनुमा दाग जो आज
भी लोग अपने दिल और दिमाग से मिटा नहीं पाए हैं वो सच जो मुंबई वासियों के दिल में
आज भी सिसक छोड़ता है लेकिन एक और कड़वी सच्चाई जिसे सुन आप भी सोचने के लिए मजबूर होंगे वो है
अपने घर का फाका दूर करने और ऐशो आराम की ज़िदगी पाने की चाह शायद कुछ यही वजह थी कसाब के आतंकवादी
बनने की
पाकिस्तान के ओकारा जिले में एक गरीब परिवार में जन्मे पाकिस्तानी आतंकवादी
के पिता रेहढ़ी पटरी लगाते थे और भाई लाहौर में एक मजदूर था लेकिन बेचारगी और
गरीबी वाली ज़िदगी उसे पसंद नहीं थी उसे
चाहिए था विदेशों में घूमना एशोआराम की ज़िदगी लेकिन वो उसे अपने इस गरीब घर में कहां मिल
पाती ऐसा भी नहीं था कि वो पढ़ाई में अव्वल नहीं था लेकिन जब घर में फाका गुज़रता
है तो पढ़ाई याद ही नहीं आती जिसके बाद उसने अपने घर का फाका दूर करने के लिए छोटी
मोटी चोरियां शुरू कर दी लेकिन जब उससे भी कुछ गुज़र बसर नहीं हुआ तो उसने 2005 में चुन लिया एक ऐसा रास्ता जो उसे भी
नहीं पता था कि वो उसे मौत का रास्ता बन जाएगा, कसाब आतंकवादी संगठन लश्कर ए तइबा
की राजनीतिक इकाई जमात उद दावा में शामिल हो गया और जमात के भड़काने पर उसने और
उसके साथियों ने भारत के खिलाफ एक ऐसा युद्ध छेड़ा जिसने उन सबको मौत के घाट उतरवा
दिया
ये सब किसकी वजह से हुआ वो थी गरीबी, बेरोजगारी और लाचारी ये एक ऐसे राक्षस
हैं जो किसी को भी गलत रास्ता अख्तियार करने पर मजबूर कर देते हैं ये सिर्फ कसाब
की कहानी नहीं है ऐसे कई युवा हैं जो इन्हीं राक्षसों के चंगुल में फंसकर अपनी
ज़िदगियां बर्बाद कर रहे हैं लेकिन मै मानता हूं इसकी जिम्मेदार वो सरकारें है जो
अपने गरीबों की जिंदगी को सुधारने वाले वादों पर खरी न उतरकर देश के युवाओं को
धोखा देती हैं और लगातार धोखा देती आ रही हैं ये सच है सुनने में थोड़ा कड़वा
ज़रुर लगता है लेकिन सच्चाई हमेशा सामने आकर ही रहती है इस फाके की कड़वी ज़िदगी पर मुझे
अपनी कुछ लाइनें याद आ रही हैं
“ पैदा हुए पर सोचा न था कि ज़िदगी फाके में कटने आयी है
बड़ा हुआ तो एक बार ऊपर देखा लेकिन फिर आंख भर आयी है
झेला न गया घर का दर्द फिर दिमाग में एक खुमारी छाई है
मर जाएंगे ये दुःख न सहेंगे अब इम्तिहान की घड़ी आई है
घऱ का फाका दूर करने के लिए अपनाई हमने गुंडयाई है
ये सोचा था कि कुछ हम बनेंगे तो घर को बरकत मिलेगी
लेकिन आराम की ज़िदगी पाने की चाह हमें किस दलदल में ले आयी है
सपनों को संजोने की राह पर चलते चलते वो मौत की राह बन आई है
वाह री ज़िदगी गरीबी वास्तव में तेरी कड़वी सच्चाई है | “
कसाब का उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि एक मजबूर युवा जिसने अपने घर का फाका
दूर करने के लिए ये राह अपनाई लेकिन वो उस राह पर इतना आगे निकल गया कि ज़िदगी
जीने की चाह भूल गया और आत्मघाती हमलावर बन गया जिसका नतीजा उसे मौत के
रूप में सामने आया विश्व में और खुद भारत में जो गरीब तबका है वो ज्यादातर इसी राह को पकड़ रहा है आतंकवादी नहीं तो हिस्ट्रीशीटर अगर इस तबके का फाका दूर करने की कोशिशें नहीं की गई तो शायद कहीं ऐसा न हो कि ये विश्व आने वाले एक सबसे बड़े संकट की ओर बढ़ जाए

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