वाह री आवाम तूने मेरी चीख सुनी तो सही....


एक आम लड़की की आवाज़.............

वाह री दिल्ली तेरी वजह से कम से कम ये मुद्दा इतना बढ़़ा उठा तो सही,

 नहीं तो न जाने कितनी लड़कियां अपने दिल में ये जख्म छुपा कर बैठी हैं ।

वाह री संसद तूने उस लड़की की चीख सुनी तो सही,

न जाने कितनी चीखें संसद की चौखट पर आकर दम तोड़ देती हैं।

वाह री मीडिया तूने आज इस मुद्दे को आवाज़ देकर उठाया तो सही,

नहीं तो न जाने लोग कब जगकर सोने चले जाते हैं पता ही नहीं चलता। 

वाह री पुलिस उस लड़की का दर्द देख आज तू पिघली तो सही,

न जाने कितनी बार तूने उस दर्द को अपनी चौकियों पर कुचल दिया।

वाह री जनता तू आज उस लड़की की मसीहा बनी तो सही,

न जाने कितनी ऐसी गल्तियां तेरे सामने से होकर चलीं गई तू फिर भी सोती रही।

वाह रे समाज तूने इस दरिंदगी को रोकने के लिए आवाज उठाई तो सही,

न जाने कितनी बार तूने इस दरिंदगी को अपनी पनाह दी है ।

वाह री मां तू आज चिल्लाकर उठी तो सही,

ना जाने कितनी बार तूने अपने लाल की गल्तियां छिपाने में उसकी मदद की है।

वाह री दुनिया तू आज एक सुर में बोली तो सही ,

मैं तो न्याय की आस में चिल्लाचिल्ला कर थक ही गई थी।

वाह रे खुदा तूने इस गुनाह को शिद्दत से लिया तो सही,

वर्ना कितनी बार तेरी चौखट पर दुखियारी न्याय की आस में आकर लौट गई हैं।

वाह रे लोकतंत्र तू आखिरकार आज जागकर उठा तो सही,

तो अब ये तो बता कि मुझे अब न्याय मिलेगा कि नहीं ?


ये ब्लॉग उस आवाज़ को दबने से रोकने के लिए जो लगातार इस तरह के जघन्य अपराध को देख चिल्लाकर खड़ा तो हो जाता है और घटना की पुरजोर तरीके से निन्दा भी करता है लेकिन सच तो ये है कि दो दिन बाद वो सब कुछ सुनकर भूलकर फिर से सोने चला जाता है हम घटनाओं की निंदा सिर्फ दो दिन जागकर ही करते हैं अगर हम दो दिन नहीं हमेशा इसी तरह जागकर निंदा करते रहेंगे तो कभी बलात्कार, हत्या, आतंकवाद जैसे जघन्य अपराध इस देश में इस समाज में कभी घटित नहीं होंगे।     

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