ब्लास्ट हो गया है तो क्या, मैं नहीं छोड़ूंगा “कुर्सी” !
हैदराबाद में दो बम
ब्लास्ट हो गए हैं पूरी लापरवाही होने के बावजूद नेता अपनी कुर्सी को पकड़ कर बैठे
हैं किसी भी हाइअलर्ट शहर में कोई निगरानी दिखाई नहीं दे रही है जैसा ब्लास्ट के
पहले चल रहा था वैसा अब भी चल रहा है सरकार के रवैये में सुस्ती तो अब भी दिखाई दे
रही है और तो और सरकार को पता ही नहीं कि अब उसे क्या करना चाहिए बम ब्लास्ट के
बाद अब जो कुछ भी हो रहा है वो मामले को हल्का करके ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश
की जा रही है और मैं ये भी जानता हूं कि वो इस मंसूबे में कामयाब भी हो जाएंगे
क्योंकि ऐसा इस बार नहीं, हर बार होता आया है क्या हम जानते नहीं है कि भारत में
अब तक कितने ब्लास्ट हो चुके हैं और कितने लोगों की जानें जा चुकी हैं लेकिन नतीजा
वही सिफर, अगर कोई आतंकवादी पकड़ भी लेते हैं तो उसे फांसी पर चढ़ाने में इंतज़ार
की घड़ियां बीत जाती है और उस ब्लास्ट में मरने वाले और घायल लोगों के परिजन भी
इंतजार करते करते आस खो देते हैं आखिर ये क्या सिस्टम है कि पहले तो एक आतंकवादी
को खुद सरकार आतंकवादी घोषित करती है और बाद में उसको फिर से आतंकवादी घोषित करने
के लिए कोर्ट में भी साबित करना पड़ता है भगवान जाने ये कैसा नियम है मैं तो मानता
हूं कि ये नियम जले पर नमक छिड़कने जैसा है ये कोई एक मर्डर या आपसी रंजिश तो नहीं
है एक भारत पर हमला है और अगर कोई भारतीय करता है तो राष्ट्र द्रोह है उसमें सजा
तो एक तारीख में ही मिलनी चाहिए। ये तो सोचने वाला विषय है ही लेकिन तब तो और शर्म
के मारे सिर झुक जाता है जब हमारे गृह मंत्री साहब कहते हैं कि हमें मालूम था कि
हमला होने वाला है और दो दिन पहले ही इसकी सूचना थी और जब हमला हो गया तो
जिम्मेदारी को फुटबॉल की तरह इधर से उधर फेंकने में लग गए, क्योंकि उन्हें डर लगने
लगा कि बढ़ी मुश्किल से तो गृहमंत्री बने हैं न जाने कितनी अग्निपरीक्षाओं से
गुज़रना पड़ा होगा उन्हें कुर्सी पाने के लिए, और अगर कुर्सी चली गई तो फिर पैदल
हो जाएंगे। लेकिन सवाल तो ये है कि जब इतना ही डर था तो क्यों नहीं पहले से अपनी
जिम्मेदारी निभाते हुए सख्ती से उन अलर्ट वाले शहरों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाकर
रखी गई, क्यों बम ब्लास्ट के बाद लोगों के मरने का इंतजार किया गया, जनता राजनीतिक
पार्टियों को चुनती है अपनी सुरक्षा के लिए लेकिन पार्टियां सत्ता में आने के बाद
अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर लेती हैं, भाई हद हो गई जनता को तो सड़क का कीड़ा
समझ लिया गया है कि कोई दूसरा देश का आकर भी पहले हमारे घर में रैकी करेगा और तो
और विस्फोट करके कीड़े की तरह मारकर चला जाएगा और नेता उस पर थोड़ा सा भाषणों वाला
मसाला छिड़क देंगे और थोड़ा सा मुआवजा रुपी मक्खन लगा देंगे बस उसके बाद कुछ नहीं
फिर मामला ठंडा हो जाएगा कभी कोई मीडिया मामले को उठाएगी तो जांच चल रही है टाल कर
वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ जाएंगे कोई तरीका ही नहीं है कायदा तो कहता है कि
जिसके भी शासनकाल में ऐसा हो वो अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेकर तुरंत अपने पद से
इस्तीफा दे क्योंकि जब तक जबावदेही तय नहीं होगी तब तक ऐसा ही चलता रहेगा और लोग
कीड़े की तरह मरते रहेंगे और नेता सुरक्षा घेरे में ही बैठे रहेंगे

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