महंगाई पर सियासी दांवपेचों से आम जनता हुई 'हलकान'
मंहगाई पर सियासी दांवपेच से अब आम जनता हलकान हो गई है उसकी समझ में अब
आता नहीं दिख रहा है कि कौन अपना है और कौन पराया किस पर भरोसा किया जाए औऱ किस पर
नहीं क्या आम जनता का भरोसा करना गुनाह है या भरोसे को तोड़ना सियासतदानों का खेल,
पता नहीं लेकिन सरकार के तेल कंपनियों के हाथ में तेल कारोबार सौंपने के फैसले को
तो मैं खुद देखकर हलकान रह गया शायद इसलिए कि सरकार ने एक तरफ तो सिलेंडरों की
संख्या में इजाफा किया तो दूसरी तरफ तेल कंपनियों को रेट बढ़ाने का पूरा अधिकार
देकर आम आदमी के पीठ में खंजर घोंप दिया जिन मुसीबतों का सामना हम आम आदमी को करना
पड़ता है वो कोई टाटा बिड़ला और अंबानी जैसे वीवीआईपी लोगों को तो नहीं करना पड़ता
इसलिए तो ये लोग हमारे जेब का दर्द नहीं समझते इनका तो काम है कि किसी न किसी तरह
जेब से पैसे निकाला जाए चाहे गरीब आदमी अपराध करने पर मजबूर हो जाए। सरकार ने अपने
फैसले में तेल के रेट तय करने का अधिकार तो तेल कंपनियों को दे दिया लेकिन वो किस
कदर अपनी मनमानी पर उतर आएंगे ये सोचा ही नहीं, भई सोचे भी क्यों सांठ गांठ भी तो
देखनी पड़ती है आखिराकार पार्टी भी तो चलानी है नहीं करेंगे तो उसका फंड कहां से
आएगा, आम आदमी का क्या, जब वो अपने दर्द से कराहता है तो बस कुछ इस तरह के शब्द
कहकर चुप हो जाता है कि हाए मर गया ये महंगाई क्या अब जान निकाल लेगी’, फिर उसी दर्द को कुछ
अपनी ज़िदगी समझकर भूल जाता है लेकिन आवाज नहीं उठाता है आवाज़ उठती भी है तो वो
दबा दी जाती है लेकिन भैंस के आगे बीन बजाने से कोई हल न निकलता न देख चुप बैठ
जाता है और इंतज़ार करता है उस खुशनुमा क्षण का जब उसे पता है कि उसकी सरकार कुछ
समय के लिए मेहरबान ज़रूर होगी वो है चुनाव का समय। उस समय कुछ तो रियायत मिल ही
जाएगी और इसी खेल में फंसकर वो फिर उसी पार्टी को चुन लेता है जिसने कुछ महीने
पहले उस की जान निकालने की कोशिश की थी पार्टियों की इस तरह की दोहरी नीति से बेरोजगारी
बढ़ रही है तो दूसरी तरफ देश की जनता पर मंहगाई की मार बढ़ रही है लेकिन सियासी
पार्टियां अपनी सियासत को चमकाने में लगी हैं जब चुनाव नजदीक आते हैं तो तुरंत
मंहगाई को कम करने की कोशिश कर दी जाती है और जैसे ही वो दूर चले जाते हैं महंगाई
फिर आसमान छूने लगती है लेकिन आम जनता तो आखिरकार पिस ही रही है मै सोचता हूं कि
वोट भी हम ही देते हैं पार्टियों को आसमान तक भी हम ही पुहंचाते हैं और फिर पिसते
भी हम हैं क्यों, क्या ये हमारे अधिकारों और चुनाव करने की क्षमता की विफलता है या
हम सिर्फ धोखा खाने के बाद ही जागते हैं लेकिन अब तो सोचना होगा भाई उसको वोट दो जो
हमें खुशहाली दे।

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