पार्टी नहीं, जनता की राहत के लिए ‘चिंतन’ करो सोनिया मैडम

कांग्रेस ने एक ‘चिंतन शिविर’ का आयोजन किया है जिसमें वो अपने किए गए कार्यों और न किए गए कार्यों पर चिंतन करेंगी जिसमें शामिल होने के लिए कांग्रेस के बड़े से बड़े नेताओं का जमघट लगा हुआ है और भई पहुंचे भी क्यों न मैडम ने जो बुलाया है ये तो सिर्फ चिंतन शिविर की बात है अगर मैडम अपने घर पर प्रधानमंत्री को भी तलब करती हैं तो प्रधानमंत्री के पहुंचने की मजबूरी बन जाती है.. जहां तक चिंतन शिविर की बात है तो चिंतन शिविर अब चिंता शिविर बनता हुआ दिख रहा है क्यों कि इस शिविर में एक ही मुद्दा सबसे ज्यादा गर्म दिखाई दे रहा है कि आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लग गई.. और भविष्य में अब वोट बैंक बढ़ाने के लिए क्या सियासी चालें खेली जाए, ताकि वोट बैंक दोबारा मिल जाए.. हो सकता है कि कुछ लॉलीपोप जनता को आने वाले दिनों में मिल जाए और हो सकता है कि जनता उसके झांसे में आकर भ्रष्टाचार, मंहगाई, और कालाधन जैसे मुद्दों को भूल जाए… क्योंकि अक्सर भोली आम जनता लॉलीपोप के झांसे में आकर भूल जाती है कौन सही है और कौन गलत। जिसका लाभ सियासी पार्टियां उठाती रही हैं…. वहीं बीजेपी भी इसी उम्मीद में चिंतन शिविर की काट खोजने में लगी हुई है ताकि वोट बैंक उसके पास चले जाए लेकिन सच तो ये है कि वोट मिलने के बाद पार्टियों का जनता से बैर भी दिखने लगता है जैसे कुछ अभी हाल ही में हुए आंदोलनों में देखने को मिला लेकिन मेरे मन में ये सवाल आया है कि आखिर 9 सालों में कांग्रेस को अभी चिंतन शिविर का आयोजन करने की क्यों याद आ गई क्या उसे लगता है कि इस बार कुछ उलटफेर हो सकता है या उसकी चिंता की वजह भी उसकी ही नीतियां है जो अब बदल ही नहीं सकती… साथ ही चिंतन शिविर में एक ऐसा चेहरा खोजने की पहल भी हो रही है जो सबसे ज्यादा चर्चित हो और जनता उसको देखकर कांग्रेस को वोट दे दे तो ये भी सच है कि कांग्रेस में ऐसा कोई चेहरा नहीं है सिवाय राहुल गांधी के, तो उन्हें 2014 में अहम भूमिका भी दिए जाने की खबर है लेकिन मै मानता हूं कि ये सब तो महज एक औपचारिक घोषणा होगी क्योंकि सच तो ये है कि सरकार के सारे फैसले तो वो और सोनिया गांधी ही लेती हैं तो कौन कहता है कि राहुल गांधी के पास अहम भूमिका नहीं है आप ही बताइए जो सारे फैसले लेता हो खुद प्रधानमंत्री को उनसे सलाह मशविरा लेनी पड़ती हो तो उनका दबदबा कैसा होगा तो सवाल ये है कि अब तक उन्होंने मंहगाई और भ्रष्टाचार पर कदम क्यों नहीं उठाए और जब उन्होंने इतनी पॉवर में होते हुए ये कदम नहीं उठाए तो हम कैसे भरोसा करें कि वो प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ कदम उठाएंगे क्योंकि सरकार के फैसले जो आते हैं वो उनकी मर्जी के ही तो होते हैं इसलिए कांग्रेस पार्टी चिंतन शिविर कराने की वजाए कुछ जनता को राहत पहुंचाने वाले फैसले लेती तो अच्छा होता और शायद सीट भी पक्की हो ही जाती।

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