पिंजरे से आजाद नहीं होगा "तोता"

कोई सरकारी संस्था जो खुद सरकार की ही मुसीबत बन जाए ऐसा हो ही नहीं सकता वो भी वो संस्था जो आजादी से लेकर आज तक सरकार के इशारे पर ही काम करती हो आप मेरा इशारा तो समझ गए होंगे मैं बात कर रहा हूं सरकार के तोते की यानी सीबीआई । जो अभी तक पिंजरे में बंद था लगता है अब वो आजाद भी नहीं होगा सरकार की मंशाओं पर तो हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं क्योंकि सरकार पर जब संकट आता है तो वो तुरंत वादा करती है लेकिन उसके बाद इंतजार में रहती है कि मामला कब ठंडा पड़ेगा और सरकार का पलड़ा कब भारी होगा और जिस दिन पलड़ा भारी हो जाता है उसी दिन वो अपना दांव खेल देती है कुछ ऐसा ही सीबीआई की स्वायत्तता को लेकर हुआ क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों पर सरकार ने आश्वासन तुरंत दिया था कि वो सीबीआई के स्वायत्तता पर गंभीर है और उस पर तुरंत एक रोडमैप भी तैयार हुआ जिस पर हो सकता है कि सीबीआई बहुत खुश हुई होगी और सीबीआई ने सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर अपनी स्वायत्ता के कुछ सुझाव सरकार को दे दिए लेकिन सरकार ने सीबीआई के एक भी सुझावों को नहीं माना और कह दिया कि जितनी स्वायत्तता सीबीआई के पास है वो बहुत है और अब उससे ज्यादा नहीं मिलेगी बताइए सरकार की ये क्या बात हुई सब जानते हैं कि सीबीआई कितनी स्वायत्त है और कितनी निष्पक्ष जांच करती है आपको बता दूं कि सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणी की थी वो कोल आवंटन की जांच को लेकर की थी अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कोल आवंटन की जो जांच होगी या बाकी अन्य मामालों और घोटालों की जांच होगी वो कितनी निष्पक्ष होगी हालांकि सरकार की ये कोई पहली वादा खिलाफी नहीं है आपको याद होगा जब अन्ना ने आंदोलन किया था तब भी सरकार ने कई वादे किए थे लेकिन एक भी पूरा नहीं किया देश को सभी सार्वजनिक इकाइयों के ऊपर सूचना का अधिकार दिया दिया था लेकिन जब मुसीबत अपने ऊपर आई तो सभी पार्टियों को अपनी तरफ लेकर आरटीआई में पार्टियों के शामिल होने से मना कर दिया यानि कि साफ है कि पार्टी का फंड बतान से मना कर दिया तो जनता ज़रुर कांग्रेस सरकार से जानना चाहेगी कि देश कांग्रेस पर भरोसा कैसे करे

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